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जन्मदिन विशेष : मिलिये देश के उभरते कवि आर्यन तोमर से और उनकी रचनाओं को पढ़िये

जन्मदिन विशेष : मिलिये देश के उभरते कवि आर्यन तोमर से और उनकी रचनाओं को पढ़िये


दिल्ली। आर्यन तोमर देश के उभरते  कवि हैं और कविता कला का दीवाना हैं। वो अपने शब्दों के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयास करते हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद हुआ, और उन्होंने 14 वर्ष की आयु से ही कविता का सफर शुरू किये।


कविता उनके लिए एक अद्वितीय तरीके से अभिव्यक्ति का माध्यम है, जिसके माध्यम से वे अपने भावनाओं, विचारों और दृश्यों को शब्दों में पिरोते है। शब्दों का सहारा लेकर वे जीवन के रंग-रूप, उत्सव, और दुख-सुख को सुनहरे तरीके से दर्शाते है।

उनके कविताओं में आपको जीवन के विभिन्न पहलुओं का सफर, प्रेम, विचार और मानवीय भावनाओं का अद्वितीय परिपेक्ष्य मिलेगा। मैं उम्मीद करता हूँ कि उनके कविताएँ आपके दिल में जगह बनाएंगी।



रचना-1

आराध्य मेरे राम हैं राम ही मेरे सखा
उनके पवन चरणों में मैने अपना शीश रखा

रघुकुल पालक श्री राम मेरे मर्यादापुरुषोतम राम है
सर्वशक्तिमान सियावर अगणित उनके नाम हैं
उत्पन्न होता उनसे ही वो प्रेम का सागर दिखा
उनके पावन चरणों के मैने अपना शीश रखा

दुष्टों के जो काल बनते ऐसे नर अवतार हैं
शिव भी जिनका ध्यान करें ऐसे दीनदयाल हैं
भक्त शिरोमणि बने बजरंगी जबसे राम नाम का अमृत चखा
उनके पावन चरणों के मैने अपना शीश रखा

मर्यादा और सरलता के बस स्वरूप राम हैं
चहुं ओर राम ये दसों दिशाएं राम हैं
हृदय हुआ चंचल मेरा जबसे राम का नाम जपा
उनके पावन चरणों में मैने अपना शीश रखा

धन्य होता जीवन उनका जो राम शरण में आते हैं 
राम नाम की शक्ति में सारे कष्ट भूल जाते हैं
बसा हो सारा ब्रह्माण्ड जिनमे ऐसे कोई भगवान दिखा
उनके पावन चरणों में मैने अपना शीश रखा



रचना-2

सम्राट अनंगपाल तोमर:-

ना प्राणों का भय उन्हें 
रण में खड़े निर्भीक हैं
युद्ध कौशल, रण कौशल 
में पारंगत वीर हैं
सामने शत्रु हो तलवार लिए
या वो धनुर्धारी हो
उस योद्धा से आखिर 
कौन जीत सकता है
जो वंशज गांडीवधारी हो

900 ई में जीती दिल्ली 
1200 तक राज किया
तोमर राजपूतों का शासन रहा, 
क्षत्रिय के नाम ये ताज किया
विदेशी ताकतों को अपनी 
तलवार के बल पर रुला दिया
आज हमने ऐसे 
वीर साहसी को भुला दिया
दिल्ली के लाल कोट को 
लाल किला बना दिया
इतिहासों के पन्नो पर से 
नाम उनका हटा दिया
ये जो शब्द कहे हैं मैने, 
ये नही कोई हास है
गौर से पर लेना इन्हे
ये हमारा इतिहास है


रचना-3

महाराणा संग्राम सिंह :-

शौर्य धरा पर अवतरित, 
वो हस्तीबल सा बलवान, 
मुगल मान मर्दन किया, 
चाहे लोदी, बाबर और सुल्तान,
 
खातोली में रूण्ड-मुण्ड, 
वो बांडोली घमासान, 
बयाना में बाढ़ ले आया, 
वो एकलिंग अवतार, 

80 घाव तन पर लागे, 
हुआ और सांगा बलवान, 
हाथ, पैर और आँख गवांकर, 
डिगा नही था अभिमान, 

घाव सहे ज्यों फुल हार हो, 
जैसे करते हो गुणगान, 
हिन्दूपत्त वो हिन्दवा सूरज, 
मेवाड़ धरा का महिमागान,

जिसका लोहा मुगलों ने माना, 
वो एकलिंगनाथ दिवान, 
इस धरा की माटी का कण-कण, 
करता हैं सदैव प्रणाम, 



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