भारत का प्लास्टिक कचरा वाहनों के ईंधन का स्रोत बन सकता है: एनआईटी अगरतला के शोधकर्ताओं का दावा
भारत में बढ़ते प्लास्टिक कचरे और ऊर्जा आवश्यकताओं की चुनौती के बीच, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) अगरतला के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया एक हालिया शोध एक वैकल्पिक और एकीकृत समाधान की संभावना प्रस्तुत करता है। इस शोध में यह दर्शाया गया है कि आम तौर पर फेंका जाने वाला प्लास्टिक कचरा ऐसे गैसोलीन-ग्रेड ईंधन में बदला जा सकता है, जिसे मौजूदा पेट्रोल इंजनों में सीधे उपयोग किया जा सकता है।
यह शोध केवल प्रयोगशाला-स्तर के निष्कर्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। परियोजना के प्रमुख शोधकर्ता दीप्तनु दे के अनुसार, वर्ष २०२४ से त्रिपुरा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ इस तकनीक को वास्तविक परिस्थितियों में लागू करने की संभावनाओं पर संवाद जारी है।
दीप्तनु दे ने बताया,
“हम २०२४ से त्रिपुरा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि इस तकनीक को किस प्रकार नियामकीय ढांचे के भीतर और पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार तरीके से लागू किया जा सकता है। हमारा उद्देश्य इसे केवल प्रयोगशाला-स्तर तक सीमित रखना नहीं है, बल्कि मौजूदा अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों के साथ इसका समन्वय करना है।”
इस शोध के केंद्र में पोस्ट-कंज्यूमर प्लास्टिक कचरे से तैयार किया गया एक गैसोलीन-रेंज ईंधन है। शोध दल ने विशेष रूप से पॉलीएथिलीन और पॉलीप्रोपाइलीन जैसे प्लास्टिक पर ध्यान केंद्रित किया है, जो भारत में घरेलू प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं। पारंपरिक यांत्रिक पुनर्चक्रण विधियों से इनका निपटान कठिन होता है, जिसके कारण ये अक्सर लैंडफिल, खुले डंपिंग स्थलों या जलाने की प्रक्रिया में चले जाते हैं और पर्यावरण प्रदूषण बढ़ाते हैं।
नियंत्रित पायरोलिसिस-आधारित प्रक्रिया के माध्यम से इन प्लास्टिकों को एक ऐसे ईंधन में परिवर्तित किया गया, जिसे “सुपर पायरोलिसिस गैसोलीन (एसपीजी)” नाम दिया गया है। पहले के कई प्रयासों में प्लास्टिक पायरोलिसिस से ऐसे मध्यवर्ती तेल प्राप्त होते थे, जिनके लिए आगे परिशोधन आवश्यक होता था। इसके विपरीत, एसपीजी को एक पूर्ण गैसोलीन-ग्रेड ईंधन के रूप में विकसित किया गया है, जिसे सीधे पेट्रोल इंजनों में उपयोग किया जा सकता है।
ईंधन के गुणधर्म परीक्षणों में पाया गया कि एसपीजी का ऑक्टेन रेटिंग लगभग १०३ है, जो अधिकांश व्यावसायिक पेट्रोल किस्मों से अधिक है। आधुनिक टर्बोचार्ज्ड पेट्रोल इंजन पर किए गए परीक्षणों में स्थिर दहन व्यवहार, बेहतर तापीय दक्षता और कम ईंधन खपत दर्ज की गई। विभिन्न परिचालन परिस्थितियों में इग्निशन की विशेषताएँ भी समान पाई गईं, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह ईंधन मौजूदा ऑटोमोबाइल तकनीक के साथ संगत है।
पर्यावरणीय प्रदर्शन भी इस शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा। वास्तविक इंजन संचालन स्थितियों में किए गए उत्सर्जन परीक्षणों में पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड, अपूर्ण दहन हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कणीय पदार्थों के उत्सर्जन में अधिकतम ३० प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई। ईंधन में सल्फर की मात्रा लगभग शून्य पाई गई, जो शहरी वायु गुणवत्ता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
शोध दल के सदस्य राज चक्रवर्ती ने बताया कि प्लास्टिक पायरोलिसिस पर पिछले कई दशकों से कार्य होता आ रहा है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसका उपयोग सीमित रहा है। उनके अनुसार, अधिकांश पूर्ववर्ती प्रयास ऐसे ईंधन विकसित करने में सफल नहीं हो पाए, जिन्हें वाहनों में सीधे उपयोग किया जा सके। मौजूदा इंजन और ईंधन अवसंरचना के अनुकूल अंतिम-उपयोग उत्पाद का अभाव व्यापक अपनाने में एक प्रमुख बाधा रहा है।
शोध में प्लास्टिक कचरे की व्यापक समस्या को भी संबोधित किया गया है। प्रतिबंधों और नियामकीय उपायों के बावजूद, प्लास्टिक कचरा नगर निकायों पर लगातार दबाव बना रहा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि प्लास्टिक को एक पुनर्प्राप्त करने योग्य कार्बन संसाधन के रूप में देखना, मौजूदा अपशिष्ट प्रबंधन रणनीतियों का पूरक बन सकता है।
आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, प्लास्टिक-आधारित इस गैसोलीन का उत्पादन लागत लगभग ₹२५ से ₹२८ प्रति लीटर हो सकती है, जो वर्तमान खुदरा पेट्रोल कीमतों की तुलना में कम है। चूँकि यह तकनीक पहले से उपलब्ध अपशिष्ट प्लास्टिक का उपयोग करती है, इसलिए यह विकेंद्रीकृत अपशिष्ट-से-ईंधन संयंत्रों के लिए भी उपयुक्त मानी जा रही है, विशेष रूप से शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में।
शोध दल की सदस्य पूनम दास ने कहा कि प्लास्टिक ने स्वास्थ्य, परिवहन और दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके अनुसार, प्लास्टिक का पूर्ण उन्मूलन न तो व्यावहारिक है और न ही यथार्थवादी। इसके बजाय, जिम्मेदार प्रबंधन और संसाधन पुनर्प्राप्ति पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
यह शोध दीप्तनु दे, राज चक्रवर्ती, पूनम दास और दीप्तनु दास (एनआईटी अगरतला) द्वारा किया गया है, जिसमें संस्थान के पूर्व छात्र प्रणब के. घोष, जो वर्तमान में बांग्लादेश में कार्यरत हैं, का भी सहयोग रहा। ईंधन रसायन, इंजन प्रदर्शन, उत्सर्जन, भंडारण स्थिरता और आर्थिक व्यवहार्यता के विस्तृत मूल्यांकन के बाद इस शोध को एक अंतरराष्ट्रीय सहकर्मी-समीक्षित ऊर्जा जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
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