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कक्षा से खेल मैदान तक: सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों की भूमिका।

कक्षा से खेल मैदान तक: सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों की भूमिका।

जोश भारत

कक्षा से खेल मैदान तक: सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों की भूमिका।

प्रलयंकर कुमार सिंह
सहायक प्राध्यापक (अंग्रेजी)
गया अभियंत्रण महाविद्यालय, गया

आज का छात्र जीवन केवल किताबों, कक्षा और परीक्षाओं तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य केवल अच्छे अंक दिलाना नहीं, बल्कि छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है। इसी सर्वांगीण विकास में सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां (Extra Curricular Activities) बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये गतिविधियां छात्रों के व्यक्तित्व, सोच और व्यवहार को निखारने में मदद करती हैं।

सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में खेल, संगीत, नृत्य, चित्रकला, नाटक, वाद-विवाद, भाषण, लेखन, एनसीसी, योग, विज्ञान प्रदर्शनी, सामाजिक सेवा आदि शामिल हैं। ये सभी गतिविधियां पढ़ाई के अलावा होती हैं, लेकिन इनका महत्व पढ़ाई से कम नहीं है। वास्तव में, ये गतिविधियां छात्रों को जीवन की वास्तविक चुनौतियों के लिए तैयार करती हैं।

वैदिक काल, महाभारत और रामायण में खेल शारीरिक विकास, सैन्य प्रशिक्षण, मनोरंजन और सामाजिक-नैतिक शिक्षा के महत्वपूर्ण साधन थे, जिनमें तीरंदाजी, घुड़सवारी, कुश्ती, शिकार और रथ-दौड़ जैसे खेल शामिल थे; ये न केवल योद्धाओं की फिटनेस बढ़ाते थे, बल्कि 'चतुरंग' (शतरंज का पूर्वज) जैसे रणनीतिक खेल राजनीति और जीवन के उतार-चढ़ावों का प्रतीक बन गए, जो चरित्र निर्माण और नेतृत्व के लिए आवश्यक थे, और 'स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन' के सिद्धांत को दर्शाते थे।

सबसे पहले यदि हम शारीरिक विकास की बात करें तो खेलों का योगदान बहुत बड़ा है। नियमित रूप से खेल खेलने से शरीर मजबूत होता है, मांशपेशियां विकसित होती हैं और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। आजकल बच्चे अधिकतर समय मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर पर बिताते हैं, जिससे मोटापा, आंखों की समस्या और थकान जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। खेल इन सभी समस्याओं से बचाने में सहायक होते हैं। दौड़ना, कूदना, फुटबॉल, क्रिकेट, कबड्डी या योग जैसे खेल शरीर को सक्रिय और फुर्तीला बनाते हैं।

खेलों का महत्व केवल शरीर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक विकास में भी इनकी भूमिका अत्यंत आवश्यक है। रोमन कवि जुवेनल, यूनानी दार्शनिकों अरस्तू और प्लेटो ने भी शारीरिक स्वास्थ्य के माध्यम से मानसिक और बौद्धिक विकास के महत्व पर बल दिया। खेल खेलने से मन प्रसन्न रहता है और तनाव कम होता है। परीक्षा का दबाव, अच्छे अंक लाने की चिंता और भविष्य की सोच से छात्र अक्सर तनावग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे में खेल उनके लिए एक अच्छा साधन हैं, जो मन को शांत करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। खेलों के माध्यम से छात्र हार और जीत दोनों को स्वीकार करना सीखते हैं, जो जीवन में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। खेल हमें सिखाते हैं कि हार अंत नहीं, बल्कि बेहतर बनने की शुरुआत होती है।

खेल छात्रों में अनुशासन और समय प्रबंधन की भावना भी विकसित करते हैं। एक खिलाड़ी को समय पर अभ्यास करना होता है, नियमों का पालन करना होता है और अपने लक्ष्य के लिए मेहनत करनी होती है। कहा जाता है कि प्रतिभा आपको शुरुआत दिला सकती है, लेकिन सफलता मेहनत से ही मिलती है। ये सभी गुण पढ़ाई और जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी काम आते हैं। जो छात्र खेलों में अनुशासित होते हैं, वे अपनी पढ़ाई को भी अच्छे से संभाल पाते हैं। खेल सिखाते हैं कि सफलता मेहनत और धैर्य से मिलती है, शॉर्टकट से नहीं। मिल्खा सिंह (फ्लाइंग सिख) ने भी कहा था कि कि “कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता।”

इसके अलावा खेलों से सामाजिक गुणों का विकास भी होता है। टीम खेलों जैसे क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल और वॉलीबॉल में छात्र मिल-जुलकर खेलते हैं। इससे उनमें सहयोग, भाईचारा, नेतृत्व और एक-दूसरे की मदद करने की भावना पैदा होती है। वे यह सीखते हैं कि अकेले कुछ भी संभव नहीं है, बल्कि मिलकर काम करने से ही लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। यह गुण आगे चलकर उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाता है।

खेल छात्रों के चरित्र निर्माण में भी सहायक होते हैं। ईमानदारी, खेल भावना और नियमों का सम्मान खेलों से ही सीखा जा सकता है। एक अच्छा खिलाड़ी कभी धोखा नहीं देता और हारने पर भी विरोधी का सम्मान करता है। यह खेल भावना जीवन में भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। जो छात्र खेल भावना से खेलते हैं, वे जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना भी सकारात्मक सोच के साथ कर पाते हैं। महेंद्र सिंह धोनी ने कहा था कि “जब आप दबाव में शांत रहते हैं, तभी सही फैसले ले पाते हैं।”

आज खेलों के क्षेत्र में करियर की भी अनेक संभावनाएं हैं। पहले खेलों को केवल समय बिताने का साधन माना जाता था, लेकिन अब यह एक सम्मानजनक पेशा बन चुका है। कई छात्र खेलों के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं। खेल कोटा, छात्रवृत्ति और सरकारी नौकरियों में भी खिलाड़ियों को विशेष अवसर मिलते हैं। इससे छात्रों का भविष्य सुरक्षित होता है और वे आत्मनिर्भर बनते हैं। नेल्सन मंडेला ने कहा था कि “खेल में दुनिया को बदलने की शक्ति होती है।”

सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां छात्रों के व्यक्तित्व विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नौकरी और करियर के क्षेत्र में भी ऐसे युवाओं की आवश्यकता होती है जिनमें संवाद कौशल, रचनात्मक सोच और समस्या सुलझाने की क्षमता हो। मंच पर भाषण देना, वाद-विवाद में भाग लेना या नाटक करना छात्रों की झिझक को दूर करता है। वे खुलकर बोलना सीखते हैं और अपनी बात को सही ढंग से प्रस्तुत करना सीखते हैं। ऐसे छात्र भीड़ में अलग पहचान बनाते हैं। कई बार छात्र अपनी छुपी हुई प्रतिभा को इन्हीं गतिविधियों के माध्यम से पहचान पाते हैं और उसे अपना करियर बना लेते हैं, जैसे संगीतकार, कलाकार, लेखक, खिलाड़ी या अभिनेता।

सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां छात्रों को आत्मनिर्भर भी बनाती हैं। जब वे किसी प्रतियोगिता में भाग लेते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है। हार की स्थिति में वे धैर्य रखना और फिर से प्रयास करना सीखते हैं। यह जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक है, क्योंकि जीवन में हमेशा सफलता ही नहीं मिलती, असफलताओं का सामना भी करना पड़ता है।

अभिभावकों की सोच भी बदलने की आवश्यकता है। कई माता-पिता यह मानते हैं कि इन गतिविधियों से पढ़ाई प्रभावित होती है, जबकि सच्चाई यह है कि संतुलन बनाए रखने से पढ़ाई और भी बेहतर होती है। जब छात्र खुश और आत्मविश्वासी होता है, तो वह पढ़ाई में भी अच्छा प्रदर्शन करता है। इसलिए माता-पिता को बच्चों की रुचियों को समझकर उनका समर्थन करना चाहिए।

विद्यालयों और महाविद्यालयों की भूमिका भी इसमें बहुत महत्वपूर्ण है। विद्यालय और महाविद्यालय यदि केवल परीक्षा परिणाम पर ध्यान दें और गतिविधियों को नजरअंदाज करें, तो छात्रों का विकास अधूरा रह जाता है। प्रत्येक विद्यालय में सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय, संसाधन और मार्गदर्शन होना चाहिए। शिक्षकों को भी छात्रों की रुचि को समझकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

अंत में कहा जा सकता है कि सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां छात्र जीवन का एक आवश्यक हिस्सा हैं। ये गतिविधियां छात्रों को न केवल सफल छात्र बनाती हैं, बल्कि एक अच्छा इंसान भी बनाती हैं। पढ़ाई के साथ-साथ इन गतिविधियों को अपनाकर ही छात्र एक संतुलित, आत्मविश्वासी और उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ सकता है। इसलिए शिक्षा के साथ-साथ सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। यही कारण है कि NEP 2020/2023 के तहत 'सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां केवल अतिरिक्त कार्य नहीं, बल्कि शिक्षा का एक अभिन्न अंग हैं' जो छात्रों को 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए तैयार करते हैं और उन्हें एक संपूर्ण, सक्षम व्यक्ति बनाते हैं। 

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